किडनी फेल्योर की समस्या से बचने के उपाय

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किडनी फेल्योर का नाम सुन कर ही हर किसी को डर लगने लगता है। यह एक ऐसी समस्या है, जो आज के समय में हर किसी को अपना शिकार बना रही है। आमतौर पर किडनी फेलियर की समस्या गलत खान-पान की वजह से तेजी से बढ़ रही है। किडनी की बीमारियां तब होती हैं, जब किडनी डैमेज हो जाती है या इसके फंक्शन में कोई परेशानी आती है।

 

क्या आपको पता है, किडनी हमारे जीवित रहने के लिए कितनी महत्वपूर्ण है? अगर किडनी में किसी तरह की कोई भी समस्या होती है, तो यह जानलेवा भी हो सकती है, इसलिए किडनी को स्वस्थ रखना बहुत ही आवश्यक है।

 

किडनी डैमेज होने का कारण आमतौर पर डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या अन्य बीमारी ही बनती हैं। अगर आपको ऐसी कोई बीमारी हो, तो तुरंत ही डॉक्टर से मिले, नहीं तो इन रोगों की वजह से आपको किडनी के रोग की समस्या हो सकती है, जिस वजह से इसका प्रभाव दूसरे अंगों पर भी पड़ सकता है, जैसे की – नर्व डैमेज, हड्डियों की कमजोरी, कुपोषण आदि समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए कहा जाता है, की अगर आपको अपने सेहत में कोई भी परिवर्तन नजर आ रहा हो, तो इसका सही समय पर इलाज करा लेना चाहिए, नहीं तो बाद में किडनी के साथ-साथ शरीर के दूसरे अंग भी काम करना बंद कर देती हैं और फिर आपको ऐसी स्थिति में डायलिसिस कराने की जरूरत पड़ सकती  है।

 

 

किडनी फेल्योर की समस्या होने पर कराएं ये जांच 

 

 

चिकित्सक लक्षण के आधार पर किडनी की सामान्य समस्या का इलाज कर सकते हैं, जबकि कुछ गंभीर किडनी रोगों में लक्षणों के आधार पर डॉक्टर कई तरह के टेस्ट करते हैं, ताकि बीमारी की सही जानकारी हो सके।

 

ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट (GFR)

 

इस टेस्ट के जरिये डॉक्टर इस बात का पता लगाते है कि, आपकी किडनी कितना और कैसे काम कर रही है।

 

 

अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन

 

  • इसके द्वारा किडनी या पेशाब की नली की जांच की जाती है। डॉक्टर इन दोनों टेस्ट में अंदरूनी अंग की तस्वीर देखकर रोग का पता लगा पाते है।

 

  • इस टेस्ट के जरिये डॉक्टर किडनी का आकार या उसके आकार में परिवर्तन का भी पता लगा सकते है।

 

  • किडनी में सिस्ट या ट्यूमर की पहचान भी इन जांचों के द्वारा आसानी से की जा सकती है।

 

 

किडनी बायोप्सी

 

इस टेस्ट में डॉक्टर किडनी से एक छोटा टिशू (ऊतक) का टुकड़ा बाहर निकालते है और इसी टिशू की जांच से रोग के प्रकार और उसकी स्टेज के बारे में पता लगाते है और साथ ही इस टेस्ट से यह भी पता चल जाता है कि, किडनियां कितनी खराब हो चुकी है।

 

 

यूरिन टेस्ट

 

इस टेस्ट के द्वारा यूरिन में एल्बुमिन की जांच की जाती है। एल्बुमिन एक तरह का प्रोटीन होता है, जो किडनी के खराब होने पर पेशाब के रास्ते से शरीर से बाहर निकलने लगता है।

 

 

ब्लड क्रिएटिनिन टेस्ट

 

क्रिएटिनिन हमारे शरीर के मेटाबॉलिज्म में सहायता करता है। जब किडनियां ठीक से काम नहीं करती हैं, तो यही क्रिएटिन मरीज के खून में घुलने लगता है। ऐसे में ब्लड में क्रिएटिनिन की जांच करके किडनी के रोग का पता लगाया जाता है।

 

किडनी की डायलिसिस

 

  • अगर लंबे समय तक इलाज नहीं किया जाता है तो इससे शरीर में गंभीर समस्याएं शुरू हो जाती हैं और किडनी फेल्योर होने का खतरा बढ़ जाता है। अगर किसी भी व्यक्ति की दोनों किडनी फेल हो जाएं तो, वो जी नहीं सकता इसलिए किडनी के पूरी तरह से फेल होने से पहले ही डायलिसिस की जरूरत पड़ती है।

 

  • अगर मरीज को एक्यूट किडनी फेल्योर हुआ है तो डायलिसिस की प्रक्रिया थोड़े समय के लिए होती है। आमतौर पर गुर्दों के ठीक हो जाने के बाद या नया गुर्दा लग जाने के बाद इस प्रक्रिया को बंद कर दिया जाता है। मगर यदि मरीज को क्रॉनिक किडनी फेल्योर हुआ है और गुर्दे इस स्थिति में नहीं हैं कि उन्हें बदला जा सके तो डायलिसिस की प्रक्रिया लंबे समय तक चलती है।

 

  • किडनी की गंभीर बीमारी यानि क्रॉनिक किडनी डिजीज होने पर किडनी जब शरीर में मौजूद अपशिष्ट पदार्थ क्रिएटिन को 15 प्रतिशत या उससे भी कम मात्रा में बाहर निकाल पाए तो डायलिसिस की जरूरत पड़ती है।

 

  • कई बार किडनी की समस्या के कारण शरीर में पानी इकट्ठा होने लगता है यानि फ्लूइड ओवरलोड होने लगता है तो भी मरीज को डायलिसिस की जरूरत पड़ती है। शरीर में पोटैशियम की मात्रा बढ़ने पर भी डायलिसिस की जरूरत पड़ती है क्योंकि पोटैशियम की मात्रा बढ़ने पर दिल की गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इसी तरह शरीर में एसिड की मात्रा बढ़ने पर भी डायलिसिस की जरूरत पड़ती है।

 

 

शॉक वेव लीथोट्रिप्सी

 

  • अगर आपके किडनी में पथरी की समस्या है, तो आप इसके लिए शॉक वेव लिथोट्रिप्सी ट्रीटमेंट का इलाज करा सकते है। ये एक नॉन सर्जिकल ट्रीटमेंट है। इस ट्रीटमेंट में किडनी की पथरी पर दबाव के साथ तरंगें छोड़ी जाती हैं, जिससे पथरी टूट जाती हैं और पेशाब के रास्ते से बाहर निकल जाती हैं।

 

  • शॉक वेव लीथेट्रिप्सी ट्रीटमेंट के द्वारा बहुत बड़ी पथरी का इलाज नहीं किया जा सकता है। इस तकनीक से आमतौर पर 2 सेन्टीमीटर से कम आकार की पथरी का इलाज किया जा सकता है। शॉक वेव लीथेट्रिप्सी ट्रीटमेंट गर्भवती महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं होता है इसलिए उन्हें इसे नहीं करवाना चाहिए। लेकिन, इस ट्रीटमेंट को लेने से पहले संबंधित डॉक्टर को अपनी हेल्थ हिस्ट्री जरूर बताएं।

 

 

सर्जरी द्वारा इलाज

 

किडनी फेलियर की समस्या पर आमतौर पर किडनी में जमा पथरी को बाहर निकालने के लिए सर्जरी सबसे उपयुक्त उपाय माना जाता है। इस ट्रीटमेंट में ऑपरेशन के द्वारा रोगियों के जिस भी अंग में पथरी होती है, उसे बाहर निकाल दिया जाता है।

 

 

किडनी प्रत्यारोपण (किडनी ट्रांस्प्लांट)

 

जब किसी भी व्यक्ति की किडनी पूरी तरह खराब हो जाती है यानी की किडनी फेल हो जाती है, तो रोगी को बचाने के सिर्फ दो उपाय होते हैं। पहला तो लगातार डायलिसिस और दूसरा किडनी ट्रांस्प्लांट। किडनी ट्रास्प्लांट एक मंहगी प्रक्रिया है और किडनी डोनर का मिलना भी बहुत मुश्किल होता है।

 

 

किडनी से संबंधित कोई भी समस्या होने पर तुरंत ही डॉक्टर से सम्पर्क करे। 

 

 


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