योग करने से पाएं खुशी और स्वस्थ गर्भावस्था

Treatment In India

गर्भावस्‍था (Pregnancy) किसी भी महिला के लिए सबसे खास समय होता है जिसमें वह खुशी, उम्‍मीद और उत्‍सुकता महसूस करती है। महिला के शारीरिक रूप से स्‍वस्‍थ और भावनात्‍मक (Emotional) रूप से मजबूत होने का सीधा असर होने वाले बच्चे के शारीरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक (Psychologist)  विकास पर पड़ता है। प्रेग्नेंसी के दौरान महिला की मन:स्‍थिति में उतार-चढ़ाव, थकान, टांगों में दर्द के साथ मरोड़ और सांस की बीमारियां गर्भावस्‍था का हिस्‍सा हैं, लेकिन गर्भवती महिलाएं आसानी से इन समस्‍याओं का सामना कर सकती हैं। गर्भावस्‍था के दौरान योग, जिसे प्रसव-पूर्व योग कहा जाता है, करने से गर्भवती महिला का मन शांत रहता है। प्रसव-पूर्व योग विशेषज्ञ और चिकित्‍सा (Treatment) व्‍यावसायिक बार-बार इस बात पर बल देते रहे हैं कि प्रसव-पूर्व (Pre-delivery) योग के साथ-साथ हृदय वाहिका (Heart valve) के व्‍यायाम जैसे पैदल चलना से गर्भावस्‍था की परेशानियों को दूर किया जा सकता है।

 

गर्भावस्था की समस्याओं से छुटकारा दिलाता है योग

 

गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्‍था की नौ माह की अवधि में अनिद्रा (Insomnia), हॉर्मोन (Hormone) प्रवाह, मन:स्‍थिति में उतार-चढ़ाव और बार-बार लघुशंका (Miniature) का आग्रह होता रहता है। गर्भावस्‍था के दौरान इन समस्‍याओं से छुटकारा पाने के लिए दो तरह के प्राणायाम (Pranayama) या श्‍वसन (Respiration) व्‍यायाम (Exercise) निर्धारित हैं: उज्‍जयी, अर्थात लंबी, तेजस्‍वी और गहरी सांस लेना जिससे गर्भवती महिला को मौजूदा स्‍थिति पर अपना ध्‍यान केंद्रित करने और चित्‍त को शांत रखने में मदद मिलती है और दूसरा नाड़ी शोधन (Pulse purification)  जिससे एक अध्‍ययन के अनुसार, शरीर की ऊर्जा के प्रवाह को संतुलित रखने में मदद मिलती है। ध्‍यान देने की बात यह है कि किसी भी तरह से सांस को रोक कर न रखा जाए और न ही अति वायु संचालन किया जाए। इससे शिशु की ऑक्‍सिजन (Oxygen) की आपूर्ति बाधित हो सकती है। प्राणायाम को तीनों तिमाहियों में दिनचर्या में शामिल किया जाना चाहिए, क्‍योंकि इससे क्रोध (Anger) और तनाव (Tension) जैसे नकारात्‍मक मनोविकारों (Negative Psychologists) से मुक्‍ति मिलती है। गर्भावस्‍था की तीन तिमाहियों के दौरान शारीरिक मुद्रा (Body currency) और व्‍यायाम अलग-अलग चरणों में अलग-अलग होते हैं ।

 

प्रथम तिमाही (First trimester)

 

प्रथम तिमाही में बहुत खुशी के साथ-साथ परेशानी महसूस होती है। जी मिचलाना (Nausea) और थका-थका (Fatigued) महसूस करना आम लक्षण हैं। योग के विशेषज्ञ प्राय: सलाह देते हैं कि इस तिमाही में योग करते समय अत्‍यधिक सावधान रहने की जरूरत होती है, क्‍योंकि गलत मुद्रा से भ्रूण (Embryo) और प्‍लेसेन्टा (Placenta) के आरोपण में रूकावट आ सकती है।

 

पहली तिमाही में ये आसन कर सकती हैं

 

मरजारी आसन (Marjari asana)

 

गर्दन और कंधों को तानता है, शरीर की कठोरता कम करता है और स्‍पाइन (Spine) को लोचपूर्ण रखता है क्‍योंकि गर्भावस्‍था की अवधि बढ़ने के साथ पीठ को अधिक शारीरिक (Body) वजन उठाना पड़ता है।

 

कोण आसन (Angle posture)

 

स्‍पाइन को लचीला रखता है और कब्‍ज (Constipation) दूर करता है जो गर्भावस्‍था का एक आम लक्षण है।

 

वीरभद्र आसन (Virbhadra Asana)

 

शरीर का संतुलन सुधारता है, बांहों, टांगों एवं पीठ के निचले हिस्‍से को मजबूती प्रदान करता है और स्‍टैमिना (Stamina) बढ़ाता है।

 

बद्धकोण आसन (Baddhakona seat)

 

नितंब और पेडू क्षेत्र में लोच बढ़ाता है, जांघों और घुटनों को तानता है, दर्द में राहत प्रदान करता है, थकान दूर करता है और गर्भावस्‍था के आखिरी दिनों तक अभ्‍यास करने पर आसानी से प्रसव (Childbirth) होने में मदद करता है।

 

योग निद्रा (Yoga Sleep)

 

तनाव और चिंता कम होती है, रक्‍तचाप (blood pressure) नियंत्रित होता है और शरीर की हर कोशिका शिथिल (Cell loosely) होती है।

 

दूसरी तिमाही (14 से 28 सप्‍ताह)

 

दूसरी तिमाही के दौरान गर्भस्‍थ शिशु की मदद के लिए शरीर में रक्‍त की मात्रा 50-60 प्रतिशत बढ़ जाती है, रक्‍त संचार (Blood circulation) तेज हो जाता है, मेटाबॉलिज्म (Metabolism) की दर बढ़ जाती है और धड़कन तेज चलती है, सांसें तेज चलती हैं। शरीर का शुगर तेजी से खत्‍म होता है और इस चरण पर गर्भस्‍थ शिशु और प्लेसेन्टा की सहायता के लिए शरीर में जमा भंडार का प्रयोग होता है। महिलाओं को अक्‍सर मिचली और हल्‍का सिरदर्द (Headache) महसूस होता है और खाने की इच्‍छा बढ़ जाती है। इस चरण पर प्रसव पूर्व योग की अधिकतम सलाह दी जाती है क्‍योंकि इससे गर्दन में ब्‍लड शुगर का स्‍तर बना रहता है।

दूसरी तिमाही के दौरान ये आसान लाभप्रद हैं

 

वज्र आसन (Vajra asana)

 

यह आसन पाचन बढ़ाता है और खाना खाने के तुरंत बाद किया जा सकता है। इससे पेडू की मांसपेशियां (Muscles) भी मजबूत होती हैं और प्रसव में महिलाओं को सहूलियत होती है।

 

मत्‍स्य कृदासन (Fisheries)

 

इससे कब्‍ज दूर होती है और पाचन भी बढ़ता है। टांगों की नसें शिथिल होती हैं जिससे गर्भावस्‍था के आखिरी दिनों के दौरान काफी राहत मिलती है।

 

कटि चक्र आसन (Kati Chakra Asana)

 

इससे शारीरिक और मानसिक तनाव (mental stress) दूर होता है तथा कमर, नितंब एवं पीठ मजबूत होती है।

 

मरजारी आसन (Marjari asana)

 

इसे बिल्‍ली मुद्रा भी कहा जाता है और यह महिलाओं के प्रजनन तंत्र (Reproduction system) को मजबूती प्रदान करने में बहुत उपयोगी है। इस आसन से गर्दन, स्‍पाइन और कंधे अधिक लचीले होते हैं।

 

ताड़ासन (Tadasan)

 

इससे पूरा मेरुदंड (spinal cord) फैलता और ढीला होता है तथा मानसिक एवं शारीरिक संतुलन स्‍थापित करने में भी मदद मिलती है।

 

उत्थान आसन (Uplift seat)

 

यह गर्भाशय, जांघों, पीठ एवं एड़ियों की मांसपेशियों को मजबूती प्रदान करता है।

 

मेरु आकर्षण आसन (Meru charm seat)

 

यह आसन उदर एवं टांगों की मांसपेशियों को तानता है तथा उनको लचीला एवं मजबूत बनाता है।

 

तीसरी तिमाही (29 से 40 सप्‍ताह)

 

तीसरी तिमाही तक शरीर में भौतिक (Physical) एवं जैविक (Biological) परिवर्तन बहुत अधिक हो चुके होते हैं और अब शिशु की हलचल भी अधिक होती है। पेट के उभरने तथा वजन बढ़ जाने से संतुलन स्‍थापित करने में दिक्‍कत हो सकती है। संतुलन स्‍थापित करने की सरल मुद्राओं से महिलाएं हल्‍का-फुल्‍का एवं अधिक संतुलित महसूस कर सकती हैं लेकिन ढुलमुल महसूस करें तो दीवार का सहारा जरूर लें। विशेषज्ञों की सलाह 6 माह के बाद लंबे समय तक पीठ के बल लेटने के विपरीत है ताकि वेना कावा (एक बड़ी नस जो स्‍पाइन के बगल से गुजरती है और गर्भाशय के पीछे मुड़ती है) पर अधिक दबाव न बनें। इस चरण पर किसी प्रसव पूर्व शिक्षक के मार्गदर्शन में योग करना उपयुक्‍त होता है क्‍योंकि यह स्‍टैमिना बढ़ाने का सही समय है। यदि कोई मुद्रा करने पर शरीर को अच्‍छा महसूस न हो तो उसे न करें।

 

संतुलन स्‍थापित करने की बुनियादी मुद्राएं जैसे उत्थित त्रिकोण आसन, उत्‍थित पार्श्‍वकोण आसन, वीरभद्र आसन और वक्र आसन टांगों में मजबूती लाने, स्‍पाइन को ठीक से सीधा रखने और रक्‍त संचार ठीक करने के लिए आदर्श आसन हैं परंतु ध्‍यान रखें कि ये आसन किसी दीवार के सहारे या कुर्सी के सहारे करें। नितंब को खोलने वाला उपाविष्‍ट कोण आसन भी इस तिमाही में एक महत्‍वपूर्ण आसन है क्‍योंकि इससे पीठ के निचले भाग में दर्द से राहत मिलती है और पेडू के चारों ओर जगह बनती है।

 

अनुसंधान अध्‍ययनों की समीक्षा के अनुसार प्रसव पूर्व योग से गर्भावस्‍था की जटिलताओं (Complications), तनाव और दर्द की संभावना काफी कम होती है और संभवत: शिशु के अपनी गर्भस्‍थ आयु की तुलना में छोटा होने का जोखिम भी घट जाता है। इस अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर मां बनने जा रही महिलाओं से आग्रह है कि वे प्रसव पूर्व योग की कक्षाओं से जुड़ें। इससे न केवल आपको अच्छा और बेहतर महसूस होगा बल्कि आप उन महिलाओं की अच्छी दोस्त बन सकती हैं जो आपकी तरह जल्द मां बनने वाली हैं और आपके बच्चे भी दोस्त बन सकते हैं। इसके अलावा प्रसव पूर्व योग घर पर समुचित मार्गदर्शन में किया जा सकता है क्‍योंकि यह केवल गर्भावस्‍था या शारीरिक सेहत (Physical health) से ही संबंधित नहीं है बल्कि इसके ढेर सारे लाभ भी हैं।


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